उत्तराखण्ड का इतिहास और उसे जानने के स्रोत
उत्तराखण्ड के इतिहास को जानने के तीन प्रमुख स्रोत हैं
1. साहित्यिक स्रोत
2. पुरातात्विक स्रोत
3. विदेशी यात्रियों के विवरण
1. साहित्यिक स्रोत
साहित्यिक स्रोतों को धार्मिक और गैर-धार्मिक (धर्मनिरपेक्ष) ग्रंथों में बाँटा जा सकता है।
(क) धार्मिक ग्रंथ
उत्तराखण्ड का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है, जिसका प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में इस पवित्र भूमि को ‘मनीषियों की पूर्ण भूमि’ तथा ‘देवभूमि’ के रूप में वर्णित किया गया है। ब्राह्मण ग्रंथों में भी इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में उत्तराखण्ड क्षेत्र को ‘उत्तर कुरु’ कहा गया है, जबकि कौषीतकि ब्राह्मण के अनुसार वाग्देवी (सरस्वती) का निवास स्थान बद्रीकाश्रम था।पुराणों में भी उत्तराखण्ड का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। स्कंद पुराण में हिमालय क्षेत्र को पाँच भागों नेपाल, मानसखण्ड, केदारखण्ड, जालंधर और कश्मीर में विभाजित किया गया है। इनमें गढ़वाल क्षेत्र को ‘केदारखण्ड’ तथा कुमाऊँ क्षेत्र को ‘मानसखण्ड’ कहा गया है। नंदा देवी पर्वत इन दोनों खण्डों गढ़वाल और कुमाऊँ को प्राकृतिक रूप से विभाजित करता है। क्षेत्रफल की दृष्टि से केदारखण्ड मायाक्षेत्र (हरिद्वार) से हिमालय तक फैला हुआ माना गया है, जबकि मानसखण्ड नंदा देवी पर्वत से कालागिरी तक विस्तृत है। स्कंद पुराण में इस क्षेत्र को ब्रह्मपुर, खशदेश और उत्तरखण्ड नामों से भी संबोधित किया गया है, तथा केदारखण्ड और मानसखण्ड को संयुक्त रूप से ‘खशदेश’ कहा गया है।अन्य धार्मिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथों में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। पुराणों में कुमाऊँ को ‘कूर्माचल’ कहा गया है, जबकि बौद्ध धर्म के पालि साहित्य में इसे ‘हिमवंत’ नाम से वर्णित किया गया है। महाभारत में गढ़वाल क्षेत्र को स्वर्गभूमि, बद्रीकाश्रम और तपोभूमि कहा गया है। आदि पर्व में ‘उत्तर कुरु’ और ‘दक्षिण कुरु’ का स्पष्ट वर्णन मिलता है, जिससे इस क्षेत्र की प्राचीनता और महत्ता सिद्ध होती है।केदारखण्ड से जुड़े कुछ विशिष्ट तथ्य भी उल्लेखनीय हैं। मान्यता है कि महर्षि व्यास ने बद्रीकाश्रम में ‘षष्टिलक्ष संहिता’ की रचना की थी। इसके अतिरिक्त, किरातों ने अपने नेता ‘शिव’ के ध्वज तले अर्जुन के साथ एक ‘तुमुल संग्राम’ (भयंकर युद्ध) किया था। यह युद्ध जिस स्थान पर हुआ, वह आज ‘विल्लव केदार’ (शिवप्रयाग) के नाम से प्रसिद्ध है, जो अलकनंदा नदी के बाएँ तट पर स्थित है।इस प्रकार वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, पुराणों और महाकाव्यों में वर्णित उत्तराखण्ड की महिमा इसे केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अद्वितीय बनाती है।
(ख) अधार्मिक व धर्मनिरपेक्ष ग्रंथ
संस्कृत साहित्य और ऐतिहासिक ग्रंथों में उत्तराखण्डउत्तराखण्ड का उल्लेख केवल वेदों और पुराणों तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृत साहित्य के अनेक महान ग्रंथों में भी इस पवित्र हिमालयी क्षेत्र का विस्तृत वर्णन मिलता है। महान व्याकरणाचार्य पाणिनी की प्रसिद्ध कृति अष्टाध्यायी में उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों का संकेत मिलता है।महाकवि कालिदास ने अपनी अमर कृतियों रघुवंशम्, मेघदूतम् और कुमारसंभवम् में हिमालय और उससे जुड़े प्रदेशों का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है। विशेष रूप से मेघदूतम् में हिमालय को ‘देवात्मा’ तथा ‘पृथ्वी का मानदंड’ कहा गया है, जो उसकी दिव्यता और महत्ता को दर्शाता है।इसी प्रकार, प्रसिद्ध साहित्यकार बाणभट्ट की कृति हर्षचरित तथा आचार्य राजशेखर की काव्य मीमांसा में भी हिमालयी क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है, जिससे इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्ता स्पष्ट होती है।राजतरंगिणी और मध्यकालीन उल्लेखकश्मीर के इतिहासकार कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी में कश्मीर के शक्तिशाली शासक ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा गढ़वाल विजय का उल्लेख मिलता है। यह विवरण दर्शाता है कि उत्तराखण्ड क्षेत्र मध्यकालीन राजनीति में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता था।मुस्लिम इतिहास ग्रंथों में वर्णनमुगल कालीन ग्रंथों में भी उत्तराखण्ड का उल्लेख मिलता है। सम्राट जहांगीर की आत्मकथा जहांगीरनामा तथा इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी की रचना तारीख-ए-बदायूंनी में भी इस पर्वतीय क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र मुगल काल में भी राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।लोकगाथाओं में इतिहास की झलकलिखित ग्रंथों के अतिरिक्त, उत्तराखण्ड की लोकपरंपराएँ भी इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। राजुला मालूशाही, रमौला गाथा, पवाड़े, जागर और हुड़की बोल जैसी लोकगाथाएँ यहाँ के सामाजिक जीवन, वीरता, प्रेमकथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं। ये लोकगाथाएँ न केवल सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखती हैं, बल्कि इतिहास के अनेक अनलिखे पक्षों को भी उजागर करती हैं।इस प्रकार, संस्कृत साहित्य, ऐतिहासिक ग्रंथों, मुस्लिम विवरणों और लोकपरंपराओं में उत्तराखण्ड का व्यापक उल्लेख इसकी प्राचीनता, सांस्कृतिक समृद्धि और ऐतिहासिक गौरव को प्रमाणित करता है।
(ग) विदेशी यात्रियों के विवरण और अन्य साहित्यिक साक्ष्य
ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तांत में उत्तराखण्डसातवीं शताब्दी के प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तांत सी-यू-की में उत्तराखण्ड क्षेत्र का उल्लेख किया है। उन्होंने इस क्षेत्र के लिए ‘पो-लि-ही-मो-पु-लो’ शब्द का प्रयोग किया, जिसे ‘ब्रह्मपुर’ के रूप में पहचाना जाता है।ह्वेनसांग ने हरिद्वार को ‘मो-यू-लो’ (मायानगरी/मयूरनगरी) कहा और उसका परिमाप 20 ‘ली’ (चीनी माप इकाई) बताया। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय हरिद्वार एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ‘गोविषाण’ नामक स्थान का भी वर्णन किया है, जिसकी पहचान ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने काशीपुर के रूप में की है।गुरुपादुका और ऐतिहासिक संदर्भजोशीमठ (ज्योतिषपीठ) से प्राप्त ‘गुरुपादुका’ नामक हस्तलिखित ग्रंथ भी उत्तराखण्ड के इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इस ग्रंथ में अनेक शासकों और वंशों का उल्लेख मिलता है, जिससे क्षेत्र की राजनीतिक और सांस्कृतिक परंपराओं का ज्ञान होता है। जोशीमठ, जिसे ज्योतिषपीठ भी कहा जाता है, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों में से एक माना जाता है और यह क्षेत्र की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।अभिलेखीय साक्ष्य और नामकरणउत्तराखण्ड के प्राचीन नामों का उल्लेख विभिन्न अभिलेखों में भी मिलता है।
- प्रयाग प्रशस्ति में इस क्षेत्र को ‘कार्तिकेयपुर’ या ‘कर्तृपुर’ कहा गया है।
- तालेश्वर ताम्रपत्र में ‘कार्तिकेयपुर’ और ‘ब्रह्मपुर’ दोनों नामों का उल्लेख मिलता है।
- पांडुकेश्वर ताम्रपत्र में केवल ‘कार्तिकेयपुर’ का उल्लेख प्राप्त होता है।
इन अभिलेखीय प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि उत्तराखण्ड का इतिहास विभिन्न कालों में अलग-अलग नामों से जाना गया, जो उसकी राजनीतिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।
2. पुरातात्विक स्रोत
उत्तराखण्ड में पुरातत्व की खोज का श्रेय हेनवुड को जाता है, जिन्होंने 1856 में चम्पावत के देवीधुरा से सबसे पहले 'कपमार्क्स' (ओखलियाँ) और शवाधान खोजे थे। यह राज्य की पहली पुरातात्विक खोज थी। 1877 में रिवेट कार्नक ने द्वाराहाट के चंद्रेश्वर मंदिर के पास 12 पंक्तियों में खुदे शैलचित्र (कपमार्क्स) खोजे, जो यूरोप के शैलचित्रों के समान हैं।
जनपदवार पुरातात्विक साक्ष्यों का विवरण इस प्रकार है
अल्मोड़ा जनपद से प्राप्त साक्ष्य
उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक शैलचित्र एवं पुरातात्विक स्थलउत्तराखण्ड केवल धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्रागैतिहासिक सभ्यता के साक्ष्यों के कारण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ प्राप्त शैलचित्र, कपमार्क, मृदभांड और ताम्र अवशेष इस क्षेत्र की प्राचीन मानव संस्कृति को प्रमाणित करते हैं।
लाखु उड्यार (गुफा): अल्मोड़ा जनपद में बाड़ेछीना के पास दलबैंड क्षेत्र में, सुयाल नदी के दाएँ तट पर स्थित लाखु उड्यार राज्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक स्थल है। इसकी खोज 1968 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् एम.पी. जोशी द्वारा की गई थी। गुफा का आकार नागफनी (कैक्टस) जैसा है।यहाँ मानवों को समूह में नृत्य करते तथा पशु पक्षियों जैसे लोमड़ी और अनेक पैरों वाली छिपकली के चित्र अंकित हैं। चित्रों में तीन रंगों का प्रयोग हुआ है नीचे श्याम (काला), मध्य में कत्थई/लोहित (भूरा-लाल) और ऊपर श्वेत (सफेद)।इतिहासकार यशवंत सिंह कठौच इसे राज्य की पहली प्रागैतिहासिक शैलचित्र खोज (ताम्रपाषाण काल) मानते हैं। इसकी तुलना मध्य प्रदेश की प्रसिद्ध भीमबेटका गुफाएँ से की जाती है। वर्ष 1992 में इसे राज्य संरक्षण में ले लिया गया।
फड़कानौली: 1985 में पुरातत्वविद् यशोधर मठपाल द्वारा खोजा गया यह स्थल लाखु उड्यार से लगभग 0.5 किमी पहले स्थित है। यहाँ तीन शैलचित्र प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक गुफा की छत नागराज के फन के समान प्रतीत होती है।
पेटशाला: 1989 में यशोधर मठपाल द्वारा खोजे गए इस स्थल पर कत्थई रंग की नृत्यरत मानव आकृतियाँ मिली हैं। यहाँ दो गुफाएँ हैं एक का आकार 8×6 मीटर तथा दूसरी का 4×3.10 मीटर है। ये चित्र मानव की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और सामूहिक जीवन शैली को दर्शाते हैं।
फलसीमा: यहाँ से योगमुद्रा और नृत्यमुद्रा में मानव आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं। एक चट्टान पर दो कपमार्क भी मिले हैं, जो प्राचीन अनुष्ठानों या सांस्कृतिक गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं।
ल्वेथाप (अल्मोड़ा-बिनसर मार्ग): यहाँ लाल रंग से बने चित्रों में मानव को शिकार करते तथा हाथों में हाथ डालकर नृत्य करते दर्शाया गया है। ये चित्र तत्कालीन जीवन, शिकार-प्रणाली और सामुदायिक संस्कृति को स्पष्ट करते हैं।
कसार देवी: अल्मोड़ा स्थित कासय पर्वत (कश्यप चोटी) पर स्थित कसार देवी मंदिर क्षेत्र के शैलचित्रों में 14 नर्तकों का अत्यंत सुंदर चित्रण है। यह स्थल धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
रामगंगा घाटी: यशोधर मठपाल ने यहाँ से पाषाणकालीन शवागार और कपमार्क्स की खोज की, जो यह सिद्ध करते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन मानव बस्तियों का केंद्र रहा है।
धनगल (बग्वालीपोखर): 1998 में कुमाऊँ विश्वविद्यालय के प्रो. एम.पी. जोशी और डी.एस. नेगी द्वारा यहाँ से ‘चित्रित धूसर मृदभांड’, तांबे की चूड़ियाँ तथा घोड़े (अश्व) की अस्थियाँ प्राप्त हुईं। ये खोजें उत्तराखण्ड में वैदिक कालीन संस्कृति के प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
चंद्रेश्वर मंदिर (द्वाराहाट): द्वाराहाट स्थित चंद्रेश्वर मंदिर से 12 पंक्तियों में लगभग 200 कपमार्क्स प्राप्त हुए थे, जिनकी खोज 1877 में रिवेट कार्नक ने की थी। द्वाराहाट को ‘कुमाऊँ का खजुराहो’ कहा जाता है।
अन्य महत्वपूर्ण स्थल
- नैनीपाताल – 1999 में यहाँ से 5 ताम्र मानवाकृतियाँ प्राप्त हुईं।
- खेखड़ – 1982 में पाषाणकालीन मृदभांड मिले।
- जाखन देवी मंदिर – यक्षों के निवास की पुष्टि से संबंधित साक्ष्य।
- हथ्वालघोड़ा, कालामाटी, महरू-उड्यार – चित्रित अवशेषों के लिए प्रसिद्ध।
- मल्ला पैनाली और डीनापानी – प्राचीन सांस्कृतिक गतिविधियों के संकेतक स्थल।
इन सभी पुरातात्विक खोजों से यह सिद्ध होता है कि उत्तराखण्ड की धरती प्रागैतिहासिक काल से ही मानव गतिविधियों का केंद्र रही है। यहाँ के शैलचित्र, कपमार्क और मृदभांड केवल कला के नमूने नहीं, बल्कि हजारों वर्ष पुराने सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के जीवंत प्रमाण हैं।
चमोली जनपद से प्राप्त साक्ष्य
ग्वारख्या गुफा और मलारी क्षेत्र के पुरातात्विक साक्ष्यउत्तराखण्ड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में अनेक ऐसे स्थल हैं, जो प्रागैतिहासिक संस्कृति और सभ्यता के महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इनमें ग्वारख्या गुफा और मलारी गाँव विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ग्वारख्या गुफा (डुंग्री गाँव, अलकनंदा तट): अलकनंदा नदी के किनारे डुंग्री गाँव में स्थित ग्वारख्या गुफा की खोज 1993 में राकेश भट्ट द्वारा की गई थी। स्थानीय मान्यता है कि गोरखाओं ने कभी यहाँ लूट का माल छिपाया था।इस गुफा की विशेषता इसकी पीले रंग की धारीदार चट्टान है, जिस पर गुलाबी और लाल रंग से कुल 41 आकृतियाँ अंकित हैं, इनमें 33 मानव और 8 पशु चित्र शामिल हैं। मानव आकृतियों को त्रिशूलाकार रूप में दर्शाया गया है।इन शैलचित्रों का मुख्य विषय ‘पशुचारक संस्कृति’ है, जिसमें पशुओं को हाँककर घेरने (घेरा बनाकर शिकार या नियंत्रण) की गतिविधि को चित्रित किया गया है। यह तत्कालीन समाज की पशुपालन आधारित जीवनशैली को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
मलारी गाँव: महापाषाणकालीन साक्ष्यचमोली जनपद का मलारी गाँव प्रागैतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ 1956 में इतिहासकार शिवप्रसाद डबराल ने महापाषाणकालीन शवागार (Megalithic burials) की खोज की। ये शवागार गर्त (गड्ढेनुमा) और मंडलाकार संरचना वाले हैं।1982-83 में गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा यहाँ उत्खनन किया गया, जिसमें अश्व (घोड़े) और मेंढक के कंकाल प्राप्त हुए। साथ ही एक हत्थेयुक्त कुतुप (पात्र) मिला, जिस पर हिमालयी मोनाल का चित्र अंकित है।वर्ष 2002 में यहाँ से एक नर कंकाल, लगभग 5 किलोग्राम का स्वर्ण मुखौटा, कांसे का कटोरा तथा एक लौह फलक प्राप्त हुआ। यह लौह फलक उत्तराखण्ड का सबसे प्राचीन लौह उपकरण माना जाता है।
विद्वानों के मतमलारी के महापाषाणकालीन अवशेषों के संबंध में विभिन्न विद्वानों ने अलग अलग मत प्रस्तुत किए हैं
- ए दानी - इसे स्वात घाटी की गांधार संस्कृति के समान मानते हैं।
- टूसी - इसे दरद समुदाय से संबंधित बताते हैं।
- सांकलिया - आर्यों से संबंध स्थापित करते हैं।
- शिवप्रसाद डबराल - किन्नौर की लिप्पा समाधियों से समानता बताते हैं।
मलारी गाँव ‘मारछा’ जनजाति का निवास स्थान है, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाता है। किमनी गाँव (थराली के समीप)पिंडर नदी के किनारे स्थित किमनी गाँव से सफेद रंग में चित्रित शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। यहाँ हथियारों तथा पशुओं विशेष रूप से हिमालयी वृषभ (जुबु/जोबा) के चित्र मिले हैं। ये चित्र तत्कालीन समाज की शिकार और पशुपालन पर आधारित अर्थव्यवस्था को उजागर करते हैं।इन सभी पुरातात्विक स्थलों से यह स्पष्ट होता है कि उत्तराखण्ड का उच्च हिमालयी क्षेत्र केवल आध्यात्मिक परंपराओं का केंद्र ही नहीं रहा, बल्कि यहाँ प्रागैतिहासिक काल से विकसित और संगठित मानव सभ्यता भी विद्यमान थी। शैलचित्र, शवागार, धातु उपकरण और स्वर्ण मुखौटे इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि और ऐतिहासिक गहराई के सशक्त प्रमाण हैं।
अन्य जनपदों से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य
उत्तराखण्ड के पुरातात्विक उत्खनन: हरिद्वार से उत्तरकाशी तकउत्तराखण्ड के विभिन्न जनपदों में हुए पुरातात्विक उत्खननों ने यह सिद्ध किया है कि यह क्षेत्र ताम्रपाषाण काल से लेकर लौह युग तक विकसित सभ्यताओं का केंद्र रहा है। यहाँ प्राप्त उपकरण, मृदभांड, धातु अवशेष और वेदिक संरचनाएँ प्राचीन जीवन शैली और सांस्कृतिक विकास के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
हरिद्वार (बहादराबाद): बहादराबाद (हरिद्वार) में 1951 में डॉ. यशवंत कठौच तथा 1953 में यज्ञदत्त शर्मा द्वारा किए गए उत्खनन में ताम्र उपकरण, पाषाण उपकरण और गेरूए रंग के मृदभांड प्राप्त हुए। ये अवशेष ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति की पुष्टि करते हैं और दर्शाते हैं कि गंगा तटवर्ती क्षेत्र प्राचीन काल से मानव गतिविधियों का केंद्र रहा है।
पौड़ी गढ़वाल के प्रमुख स्थलथापली (अलकनंदा का दायाँ तट): 1982-83 में के पी नौटियाल के निर्देशन में यहाँ उत्खनन किया गया। थापली से धान की खेती के साक्ष्य प्राप्त हुए, जो कृषि आधारित समाज की पुष्टि करते हैं।यहाँ से 1.20 मीटर गहराई पर चित्रित धूसर मृदभांड मिले, जिन पर सूर्य, सिग्मा और पुष्प के चित्र अंकित हैं। साथ ही तांबे की चूड़ियाँ, अंजन शलाका (काजल लगाने का उपकरण) तथा पक्की मिट्टी की चिड़िया प्राप्त हुई। ये वस्तुएँ सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति को दर्शाती हैं।
रानीहाट (श्रीनगर, अलकनंदा का दायाँ तट): 1977 में नौटियाल द्वारा किए गए उत्खनन में यहाँ से ईंटें, अस्त्र शस्त्र तथा कच्चा लोहा गलाकर मछली और शिकार के औजार बनाने के साक्ष्य प्राप्त हुए। यह स्थल लौह तकनीक के विकास और संगठित बस्ती का संकेत देता है।
उत्तरकाशी जनपद के पुरातात्विक साक्ष्यपुरोला (कमल नदी, यमुना की सहायक): पुरोला से ‘शंखलिपि’ में लिखा काले रंग का एक आलेख प्राप्त हुआ है, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। यहाँ से घोड़े की हड्डियाँ, लाल-काले बर्तन तथा उड़ते हुए गरुड़ के आकार की ‘इष्टिका वेदिका’ प्राप्त हुई है।लोहे के फरसे और बड़ी मात्रा में हड्डियों की उपस्थिति से यहाँ व्यापक पशुबलि की परंपरा का संकेत मिलता है, जो वैदिक अनुष्ठानों से जुड़ा हो सकता है।
हुडली: यहाँ से नीले रंग के शैलचित्र प्राप्त हुए हैं, जो उत्तराखण्ड की शैलचित्र परंपरा का एक विशिष्ट उदाहरण हैं।
पिथौरागढ़ (बनकोट): बनकोट (पिथौरागढ़) से 8 ताम्र मानवाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं। ये मानवाकृतियाँ ताम्र संस्कृति की विशिष्ट पहचान मानी जाती हैं और इस क्षेत्र में धातु तकनीक के विकास का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।हरिद्वार, पौड़ी गढ़वाल, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में हुए उत्खननों से स्पष्ट है कि उत्तराखण्ड प्राचीन काल में कृषि, धातुकर्म, शिकार, पशुपालन और धार्मिक अनुष्ठानों का समृद्ध केंद्र था। ताम्र मानवाकृतियाँ, शंखलिपि लेख और वेदिक वेदिकाएँ इस क्षेत्र की सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक गहराई को प्रमाणित करती हैं।उत्तराखण्ड की यह पुरातात्विक विरासत न केवल राज्य के अतीत को उजागर करती है, बल्कि भारतीय सभ्यता के विकास क्रम को समझने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।
3. ऐतिहासिक काल के प्रमुख स्रोत
उत्तराखण्ड के प्रमुख अभिलेख एवं ऐतिहासिक उत्खननउत्तराखण्ड के विभिन्न स्थलों से प्राप्त शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के और मूर्तियाँ इस क्षेत्र के प्राचीन राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को उजागर करती हैं। विशेष रूप से कालसी, लाखामंडल और कत्यूर घाटी के अभिलेख अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
कालसी अभिलेख (देहरादून): देहरादून जनपद में यमुना और अमलावा (टौंस) नदी के संगम पर स्थित कालसी का प्राचीन नाम कालकूट, खलतिका और युगशैल था।इस शिलालेख की खोज 1860 में फॉरेस्टर ने की थी। यह लगभग 10 फुट ऊँचा और 8 फुट चौड़ा है। अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में अंकित है तथा इसे सम्राट अशोक का 13वाँ/14वाँ शिलालेख माना जाता है।ऐतिहासिक महत्वअशोक ने इस क्षेत्र को ‘अपरांत’ तथा यहाँ के निवासियों को ‘पुलिंद’ कहा है। शिलालेख में अहिंसा और धम्म का संदेश दिया गया है। 1254 ई. में नसीरुद्दीन महमूद द्वारा इसे आंशिक रूप से खंडित किया गया। लेख के अंत में पाँच यवन (यूनानी) राजाओं का उल्लेख है।7वीं शताब्दी में ह्वेनसांग ने कालसी को ‘सुधनगर’ कहा था।गजतमेइस शिला पर एक हाथी की आकृति उकेरी गई है, जिसके पैरों के बीच संस्कृत में ‘गजतमे’ (सर्वश्रेष्ठ हाथी) लिखा है। इसे आकाश से उतरते हुए दर्शाया गया है, जो भगवान बुद्ध का प्रतीक माना जाता है।
लाखामंडल (देहरादून): यमुना और रिखनाड़ (गोदरगाड़) नदियों के संगम पर स्थित लाखामंडल का प्राचीन नाम ‘मढ़’ था, जिसे सिंहपुर भी कहा जाता है।यहाँ छत्रयुक्त (पैगोडा शैली) शिव मंदिर स्थित है। यहाँ से कत्यूरी राजकुमारी ‘ईश्वरा’ का ब्राह्मी लिपि में संस्कृत श्लोकयुक्त अभिलेख प्राप्त हुआ है। साथ ही अर्जुन/भीम (या जय-विजय) की दो विशाल मूर्तियाँ तथा गुप्तकाल से पूर्व की अनेक प्रतिमाएँ मिली हैं।
अम्बाड़ी (देहरादून): यहाँ से शुंगकालीन शासक भद्रमित्र शुंग का अभिलेख प्राप्त हुआ है, जो इस क्षेत्र में शुंग शासन के प्रभाव को दर्शाता है।
त्रिशूल अभिलेख: ये अभिलेख शंख लिपि में अंकित हैं, जो प्राचीन लिपि परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
गोपेश्वर (गोपीनाथ मंदिर): गोपीनाथ मंदिर के अभिलेखों में नागवंशी राजा विशुनाग तथा नेपाली शासक अशोक चल्ल का उल्लेख मिलता है।
बाड़ाहाट (शक्ति मंदिर): यहाँ के अभिलेख में नागवंशी गुहनाग और अशोक चल्ल का उल्लेख है, जो मध्यकालीन राजनीतिक संबंधों की ओर संकेत करता है।
अल्मोड़ा के कुणिंद सिक्के: 1979 में कत्यूर घाटी (अल्मोड़ा बागेश्वर सीमा) से कुणिंद शासकों के 15 सिक्के प्राप्त हुए।इन सिक्कों पर शिवदत्त, शिवपालित, हरिदत्त, मार्गभूति, आशेक और गोमित्र के नाम अंकित हैं। इन्हें हिमालय क्षेत्र की प्रथम मुद्रा माना जाता है। वर्तमान में ये सिक्के अल्मोड़ा संग्रहालय तथा ब्रिटेन के अल्बर्ट म्यूजियम में सुरक्षित हैं।अन्य महत्वपूर्ण उत्खननवीरभद्र (ऋषिकेश)1973-74 के उत्खनन में यहाँ से कुषाणकालीन भवन अवशेष और सिक्के प्राप्त हुए।मोरध्वज1887 में मरखाम तथा 1979-81 में गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा उत्खनन किया गया। यहाँ से योगासन मुद्रा में बुद्ध/बोधिसत्व की मूर्तियाँ (बौद्ध धर्म का प्रभाव), कृष्ण की केशिवध प्रतिमा, 23 अंडाकार मृणफलक तथा 8 मृणमुद्राएँ प्राप्त हुईं।
अन्य प्रमुख अभिलेख
- बागेश्वर लेख - कत्यूरी राजा बसंत देव, खर्परदेव और निंबर का उल्लेख।
- टिहरी का पलेठी लेख - नागवंशीय संदर्भ।
- बास्ते ताम्रपत्र (पिथौरागढ़) - आनंदपाल का ताम्रपत्र, जिसमें गोरखा सेनानायक मोहन थापा का उल्लेख है।
कालसी के अशोक शिलालेख से लेकर लाखामंडल, गोपेश्वर और कत्यूर घाटी के सिक्कों तक, उत्तराखण्ड के अभिलेख और उत्खनन इस बात का प्रमाण हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है।ये अभिलेख न केवल स्थानीय इतिहास को उजागर करते हैं, बल्कि भारतीय इतिहास की व्यापक धारा में हिमालयी क्षेत्र के योगदान को भी स्थापित करते हैं।
4. आद्य ऐतिहासिक काल और पौराणिक महत्त्व
आद्य ऐतिहासिक काल में उत्तराखण्डआद्य ऐतिहासिक काल में उत्तराखण्ड को आध्यात्मिक चेतना और आर्य सभ्यता का प्रमुख केंद्र माना जाता है। हिमालय की गोद में स्थित यह क्षेत्र प्राचीन नगरों, सांस्कृतिक परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं का संगम रहा है।
प्राचीन नगरों के प्रमाणउत्तराखण्ड में कई प्राचीन नगरों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं
- काशीपुर (प्राचीन गोविषाण) - यहाँ 2600 ई.पू. की ईंटें मिली हैं।
- हरिद्वार (गंगाद्वार) -इसे गेरूए रंग की सभ्यता का नगर माना गया है।
- कनखल - प्राचीन धार्मिक केंद्र।शत्रुघ्न और कालकूट – पौराणिक महत्व वाले स्थल।
- श्रीनगर - राजा सुबाहु की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध।
ये नगर दर्शाते हैं कि उत्तराखण्ड प्राचीन काल में विकसित शहरी जीवन और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र था।जीवन की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यतापौराणिक मान्यता के अनुसार जलप्लावन (प्रलय) के बाद अल्कापुरी (ब्रह्मावर्त/माणा) के निकट ही आदिमानव ने जीवन की पुनः शुरुआत की। कहा जाता है कि मनु माणा क्षेत्र में आए थे और उनके नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम ‘मानसखण्ड’ पड़ा। यह कथा उत्तराखण्ड को मानव सभ्यता के प्रारंभिक स्थलों में एक विशेष स्थान प्रदान करती है।
सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्वबद्रीनाथ मंदिर के समीप पाँच प्रमुख गुफाएँ स्थित हैं। गणेश गुफा, नारद गुफा, स्कंद गुफा, मुचकुंद गुफा और व्यास गुफा। मान्यता है कि यहाँ वेदों और पुराणों की रचना हुई।लोककथाओं के अनुसार रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की रचना भी इसी पवित्र क्षेत्र में संपन्न हुई। इस कारण उत्तराखण्ड को ‘देवभूमि’ की संज्ञा दी जाती है।
प्राचीन भूगोल और जनजातियाँपौराणिक ग्रंथों में तिब्बत क्षेत्र को ‘उत्तर कुरु’ तथा मेरठ हस्तिनापुर क्षेत्र को ‘दक्षिण कुरु’ कहा गया है। इन दोनों को जोड़ने वाले मार्ग (जो वर्तमान उत्तराखण्ड से होकर गुजरता था) का नाम संभवतः ‘कारूपथ’ पड़ा।इस क्षेत्र में यक्ष, किन्नर, खश और किरात जैसी प्राचीन जनजातियाँ निवास करती थीं, जो हिमालयी संस्कृति की आधारशिला मानी जाती हैं।
राजवंशों का क्रम
आद्य ऐतिहासिक काल के पश्चात उत्तराखण्ड विभिन्न राजवंशों और शासकों के अधीन रहा
- कत्यूरी राजवंश
- चंद राजवंश
- पंवार राजवंश
- टिहरी रियासत
- गोरखा शासन
- अंग्रेज़ों का शासन
इन राजवंशों ने उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक, प्रशासनिक और धार्मिक संरचना को आकार दिया। आद्य ऐतिहासिक काल से लेकर मध्यकालीन युग तक उत्तराखण्ड आध्यात्मिक चेतना, आर्य संस्कृति और प्राचीन सभ्यता का केंद्र रहा है। यहाँ के प्राचीन नगर, गुफाएँ, पौराणिक कथाएँ और राजवंशीय परंपराएँ इस बात का प्रमाण हैं कि हिमालय की यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रही है।
